डीडवाना कुचामन जिला में नवरात्री के दिनों में भगतगण दर्शन एवं आशीर्वाद के लिए माता के मंदिर में जाते है जिससे उनके मन की भावना और मन्नत माता के सामने प्रकट करके अपना जीवन सरल और सुखमय बनाते है अपने आस पास बहुत सारे मंदिर जिनके बारे में अपने पूर्वज भली भांति जानते है जिनमे कैवाय माता ,इंद्र बाई सा ,शाकम्भरी देवी ,पाढाय माता जैसे अनेको मंदिर है जिनकी दुरी जिले और स्टेशन से कुछ ही समय की है।
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कैवाय माता मंदिर

कैवाय माता दहिया राजपूत राजवंश की कुलदेवी हैं .मकराना और परबतसर तहसील के बीच त्रिकोण पर परबतसर से 6-7 की. मी. उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वतमाला से परिवेष्टित किणसरिया गाँव है।
जहाँ एक विशाल पर्वत श्रंखला की सबसे ऊँची चोटी पर कैवायमाता का बहुत प्राचीन और प्रसिद्ध मन्दिर अवस्थित है । नैणसी के अनुसार किणसरिया का पुराना नाम सिणहाड़िया था । कैवाय माता का यह मन्दिर लगभग 1000 फीट उँची विशाल पहाड़ी पर स्थित है । मन्दिर तक पहुँचने के लिए पत्थर का सर्पिलाकार पक्का मार्ग बना है, जिसमे 1121 सीढियाँ है ।सभागृह के प्रवेश द्वार के बाहर दो भैरव मूर्तियाँ है जो काला – गोरा के नाम से प्रसिद्ध है । नवरात्र , विवाह तथा अन्य शुभ अवसरों पर निकटवर्ती अचंल के लोग जात – जडुले और मन्नत मांगने व देवी से इच्छित फल कि कामना लिए वहाँ आते हैं ।


इंद्र बाईसा

इंद्र बाईसा एक पूजनीय आद्यशक्ति थीं, जिनका जन्म मकराना तहसील के बेसरोली के पास खुड़द गाँव में वि.सं. १९६४ में हुआ था और उन्हें करणी माता का चौथा अवतार माना जाता है। उन्होंने अपनी भक्ति से लोगों के हृदय में एक विशेष स्थान बनाया और करणी माता का मंदिर बनवाया। लोग आज भी उन्हें आवड़ माता के रूप में पूजते हैं। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां किसी भी श्रद्धालु को नंगे सिर प्रवेश नहीं दिया जाता है। इसके लिए पुरुष श्रद्धालुओं को टोपी या रूमाल लगाकर मंदिर में जाना पड़ता है। जो मंदिर के बाहर रखी होती है।श्रद्धालु भक्तो के लिए निःशुल्क भोजन और रहने की व्यवस्था भी है। नवरात्री में यंहा लाखो की संख्या में भक्त इकठ्ठा होते है। बेसरोली स्टेशन से 5km की दुरी पर है।


शाकम्भरी देवी

माँ शाकम्भरी देवी दुर्गा या ईश्वरी का एक अवतार हैं, जिनकी पूजा ‘दिव्य माँ’ के रूप में की जाती है। वे शक्ति का वह रूप हैं जो सूखे और अकाल के समय वंचित लोगों की सहायता के लिए पृथ्वी पर अवतरित होती हैं। संस्कृत में ‘शाका’ का अर्थ है सब्ज़ियाँ और ‘अम्बरी’ का अर्थ है भूखों की देखभाल करने वाली। इसी से इस देवी का नाम पड़ा, जो आदि शक्ति हैं।मुख्य कुचामन शहर के दक्षिण में लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर शाकम्भरी पहाड़ी स्थित है, जिसे देवी शाकम्भरी या शाकुंभरी का निवास माना जाता है।
मां शाकंभरी मंदिर का निर्माण सातवीं- आठवीं शताब्दी मे हुआ था। शाकंभरी को दुर्गा का अवतार माना जाता है। मंदिर में भादवा सुदी अष्टमी को मुख्य पर्व आयोजित होता है। दोनों ही नवरात्रों में माता के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। दंत कथाओं और स्थानीय लोगों के मुताबिक मां शाकंभरी की कृपा से यहां चांदी की भूमि उत्पन्न हुई। जो बाद में देवी ने चांदी को नमक में बदल दिया।

पाढ़ाय मंदिर

डीडवाना से 12 km दूर मारवाड़ बालिया स्टेशन से 2km की दुरी पर नमक क्षेत्र में पाढाय माता का प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर आदि शक्ति स्वरूप होने के कारण प्रसिद्ध है। मंदिर में स्थापित शिलालेख के अनुसार विक्रम संवत ९०२ में भैंसा सेठ द्वारा इसका निर्माण कराया गया था। माता के मंदिर में दो मूर्तियां हैं। इनमें से एक बालिका तथा दूसरी महिषासुर मर्दिनी के रूप में हैं। इनके बाईं और भैरवनाथ की मूर्ति है। माता आसोज सुदी नवमी तिथि को प्रकट हुई थी और चैत्र सुदी चतुर्दशी को माता का मंदिर बनाया गया था। इसलिए चैत्र की चतुर्दशी को यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है।

